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corona in ayurveda

02 April,2021

# कोरोना एवं आयुर्वेद में उसकी प्रासंगिकता

महर्षि जतूकर्ण,
भगवान पुनर्वसु: के उन पाँच शिष्यों में से एक थे जिन्होनें अपनी जतूकर्ण संहिता में कोरोना एवं एसे ही कई भूतकाल एवं भविष्यकाल में उत्पन्न हुए और होने जा रहे ज्वरों का उल्लेख आयुर्वेद सिद्धान्तानुसार ऋतु के आधार पर बड़ी स्पष्टता से कर दिया था 12वी सदी तक ये सहिंता पूर्ण रूप से अपने वास्तविक स्वरूप में उपलब्ध थी किन्तु उसके बाद आयुर्वेद की ये विरासत कुछ पन्नो में सिमट कर रह गयी
महर्षि जतूकर्ण ने अपनी संहिता में ज्वर निदानस्थान के जिस सूत्र में इस रहस्य को खोला हे वो सूत्र इस प्रकार

हेवसन्त: शरदो: प्राय: प्राकृतो अन्यत्र वैकृत:

इस एक छोटे से सूत्र में कोरोना की पूरी जन्मकुंडली महर्षि जतूकर्ण ने खोलकर रख दी हे ये साधारण सूत्र नहीं हे किन्तु उससे पहले ये हमारी जिम्मेदारी हे की हम इस सूत्र के साथ आयुर्वेद में अन्यत्र बिखरे पड़े ज्ञान से इसका सामन्जस्य स्थापित करे सबसे पहले तो हम इस सूत्र का अर्थ समझे

इस सूत्र का अर्थ हे की, शरद ऋतु में उत्पन्न पित्तज ज्वर तथा वसंत ऋतु में उत्पन्न कफ़ज ज्वर प्राकृत ज्वर हे इसके अलावा अन्य ज्वर वैकृत ज्वर हे ये प्राकृत और वैकृत ज्वर की जो theory महर्षि जतूकर्ण द्वारा दी गयी थी वो साधारण बात नही थी उन्होने यहाँ ऋतु अनुसार ज्वर की उत्पत्ति, उनके बलाबल और उनकी साध्य-असाध्यता को आयुर्वेद के विद्वानों के समक्ष स्पष्ट कर दिया थाउन्होने ये आदेश कर दिया था की वसंत ऋतु में ऋतुजन्य जब जब ज्वर उत्पन्न होगा वो प्राकृत ही होगा (अर्थात ऋतुअनुसार दोषप्रकोप प्रकृति कहलाती हे,और उससे होने वाला ज्वर प्राकृत समझा जाएगा लेकिन प्राकृत होना सुखसाध्य का बोधक नहीं समझा जाना चाहिए हालाँकि पैतिक तथा कफज प्राकृत ज्वर एकदोषज तथा लन्घन को सहन योग्य होने से साध्य में रखे गए हे )

कफो वसन्ते तमपि वातपित्तं भवेदनु

यानि वसंत ऋतु में प्रकुपित कफ जिस ज्वर को उत्पन्न करता हे उसमे भी प्राय: वात और पित्त का अनुबंध तो रहता हे किन्तु वे वर्षा ऋतु में उत्पन्न हुए वातिकज्वर में अन्य दो दोषों के समान प्रकुपित नहीं रहते हे इसलिए वासन्तिक कफ़ज ज्वर साध्य हो जाता हे यहाँ तक ये बात स्पष्ट हो चुकि हे की कफ़ज ज्वर प्राकृत हे वसंत में आना ही आना हेऔर ये साध्य हे

अब हम महर्षि जतुकर्ण के आधार पर कफ़ज ज्वर के लक्षणों का तादम्य कोरोना के लक्षणो से करके देखते हे तो हम पाते हे की दोनो के लक्षण बिल्कुल समान हे और इन लक्षणों की पुष्टि एवं आधार जो शास्त्र बनता हे वो हे आयुर्वेद की अतुल्य विरासत 8वी सदी का आचार्य माधवकर कृत

माधवनिदानमस्तेमित्यं स्तिमितो वेग आलस्यं मधुरास्यता शुक्लमूत्रपूरीषत्वं स्तम्भस्तृप्तिरथापि चगोरवं शीतमुतक्लेदो रोमहर्षोsति निद्रता स्रोतोरोधो रुगल्पत्वं प्रसेको लवणा स्यता नात्युष्णगात्रतां च्छर्दिर्लालास्रा वोsविपाकता प्रतिश्यायोsरुचि: कास: कफज़ेsक्ष्णोश्च शुक्लता (मधुकोश 2/12-13)

आचार्य कफ ज्वर के जो लक्षण यहाँ बतलाते हे उनको यहाँ विस्तार से समझने की मह्त्ती आवश्यकता हे जो पूरी तरह से WHO द्वारा निर्देशित कोरोना के लक्षणो से साम्यता रखते हे Corona का पहला लक्षण हे

1. Fever ज्वर (आचार्य जब कफज्वर कह कर इसको सम्बोधित करते हे तो स्वभाविक रूप से ज्वर को उसके लक्षणो में समाहित कर लेते हे)

2. Cough कास ( मधुकोश 2/13)

3. Runny Nose प्रतीश्याय ( मधुकोश 2/13)

4. Vomiting वमन (मधुकोश 2/13)

5. Loss of Appetites अरुचि (कफादन्नारुचिर्भवेत् सु• उ• 39:27)

6. Fatigue श्रम (श्रान्तत्व या थकावट)(सु उ 39: 25)
7. Myalgia सर्वांगग्रहण, सर्वांगवेदना, *अँगमर्द(सु उ 39:13)

8.Sore throat

Interesting facts Loss of appetite जो Corona का एक मुख्य लक्षण हे वो आचार्यो ने आयुर्वेद में कफज ज्वर का विशेष पूर्वरूप स्वीकार किया हे Ref.

कफादन्नारुचिर्भवेत् (सु• उ• 39:27)साथ ही
Fatigue श्रम (श्रान्तत्व या थकावट) एवं
Myalgia सर्वांगग्रहण,सर्वांगवेदना, अँगमर्द को


आचार्यों ने सभी ज्वरों में सामान्य पूर्वरूप और सामान्य लक्षणों में सम्मिलित किया हे Ref.

सर्वांगग्रहणं (सु उ 39:13)
श्रमो (सु उ 39: 25)
कफ़ज ज्वर का एक लक्षण जो आचार्य माधवकर ने सबसे पूर्व में निर्देशित किया हे वो हे

स्तिमीतो वेग (जिसका अर्थ हे मंदवेगज्वर )
एक और शब्द आता हे नात्युष्णगात्रता (शरीर अधिक गर्म नहीं रहता हे)

जब हम corona के patient के Sign and Symptoms का Data Analysis करते हे तो हम पाते हे की 65 % patient में ये 39°C से उपर गया ही नहीं जबकि High grade fever या कहे hyperpyerxia 39°C या उसके उपर नज़र आना चाहिए था जो की पैत्तीक ज्वर का मुख्य लक्षण हे मेरा व्यक्तिगत मत हे की कोरोना को

कफज ज्वर के अन्तर्गत ही समझना चाहिये इसे यहाँ

वातश्लेश्मीक ज्वर के अन्तर्गत नही समझा जाना चाहिए क्युँकि वसंतऋतु के काल में न तो वात का संचय हे न प्रकोप और न शमन इसलिए जब वात का प्रकोप नहीं हे तो वात और पित्त को कफज ज्वर में सिर्फ अनुबंध के रूप में हम स्वीकार कर सकते हे लेकिन प्रकोप में नही शामिल कर सकते हे इस विषय को conclude करते हुए मैं एक तथ्य का यहाँ जरूर जिक्र करना चाहूँगा,और वो ये की India में जो पहला case Corona का detect हुआ हेवो कफ के स्वाभाविक संचय और प्रकोप के मध्य ही हुआ हे शिशिर से वसंत तक सिर्फ और सिर्फ कफ का ही संचय और प्रकोप का काल रहेगा जो ये बतलाता हे की हमे इन माह में आयुर्वेद अनुसार ही आहार विहार की पालना करनी चाहिये जिससे हम कोरोना और कोरोना जेसे ही बाकि ऋतुजन्य ज्वरों से मुक्ति पा सके

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